Thursday, November 1, 2012


एक उदास साँझ / अज्ञेय


सूने गलियारों की उदासी ।
गोखों में पीली मन्द उजास
स्वयं मूर्च्छा-सी ।
थकी हारी साँसे, बासी ।

चिमटी से जकड़ी-सी नभ की थिगली में
तारों की बिसरी सुइयाँ-सी
यादें : अपने को टटोलतीं
सहमीं, ठिठकी, प्यासी ।

हाँ, कोई आकर निश्चय दिया जलाएगा
दिपता-झपता लुब्धक सूने में कभी उभर आएगा ।
नंगी काली डाली पर नीरव
धुँधला उजला पंछी मँडराएगा ।
हाँ, साँसों ही साँसों में रीत गया
अंतर भी भर आएगा ।
पर वह जो बीत गया- जो नही रहा-
वह कैसे फिर आएगा ?

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