Monday, June 1, 2026

त्रिवेणी संघ

 *फारवर्ड प्रेस*


*त्रिवेणी संघ, जिसने डाली हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय की बुनियाद*


*बिहार में 1930 के दशक के साथ ही खासतौर से उत्पीड़ित जातियों के जागरण ने नए दौर में प्रवेश किया, जिसके केंद्र में पिछड़े थे। पिछड़ी जातियों के साझा पहचान व चेतना ने शक्ल अख्तियार करना शुरु किया। बता रहे हैं रिंकु यादव।*


*आधुनिक इतिहास में जब उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की बात कही जाती है तब बिहार के गौरवशाली इतिहास को भी शामिल किया जाता है। हालांकि सच यह भी है कि इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में त्रिवेणी संघ के संघर्ष का अध्याय शामिल नहीं रहता है और इसके नायकों का नाम नायकों की सूची से गायब रहता है। यह अकारण अचेतन नहीं, बल्कि सचेतन है। एक समय त्रिवेणी संघ ने जीवन के हर क्षेत्र में कायम ऊंची जातियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। संघर्ष के इतिहास के उन अध्यायों से विभिन्न रंगों में रंगी प्रभुत्ववादी शक्तियां अब भी घबराती हैं। यहां तक कि प्रगतिशील-सेकुलर इतिहास बोध में आज भी उत्पीड़ित समूहों के संघर्ष और उसके नायकों को उचित जगह नहीं मिल पाई है।मसलन, हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्यों में एक बिहार में सामाजिक न्याय की शक्तियां ताकतवर हैं, लेकिन त्रिवेणी संघ का संघर्ष व उसके नायकों को विस्मृति के अंधेरे से मुक्ति नहीं मिली है। यह निश्चित रूप से त्रासदपूर्ण और सामाजिक न्याय की जारी लड़ाई व राजनीति के संकट को रेखांकित करता है।*


*बहुतों को वर्तमान की चुनौतियों पर बात करने के बजाय इतिहास के इतने पीछे के अध्यायों से गुजरना महत्वहीन लग सकता है। लेकिन वर्तमान की चुनौतियां और आगे बढ़ने की जद्दोजहद में हम बार-बार इतिहास से भी गुजरते हैं। यह कोई अतीत मोह नहीं है, अपनी जड़ों को पकड़ने और उससे ताकत लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है ।*


*बिहार में 1930 के दशक के साथ ही खासतौर से उत्पीड़ित जातियों के जागरण ने नए दौर में प्रवेश किया, जिसके केंद्र में पिछड़े थे। पिछड़ी जातियों के साझा पहचान व चेतना ने शक्ल अख्तियार करना शुरु किया। उत्पीड़ित जातियों की एकता आगे बढ़ी। जाति से जमात बनने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अलग-अलग जाति संगठनों से साझा संगठन बनाने की ओर कदम बढ़ाया गया। त्रिवेणी संघ का गठन 30 मई, 1933 को उस समय के शाहाबाद जिले (वर्तमान में रोहतास जिला) के करगहर में हुआ। इसके संस्थापकों में चौधरी जे.एन.पी. मेहता, सरदार जगदेव सिंह यादव और डॉ. शिवपूजन सिंह प्रमुख थे। 1935 में प्रदेश स्तर पर त्रिवेणी संघ का गठन हुआ। गणपति मंडल सचिव और दासू सिंह अध्यक्ष बनाए गए। बाद में ऑल इंडिया त्रिवेणी संघ का गठन भी हुआ। उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच के बतौर इसने बिहार में स्पष्ट दृष्टि व व्यापक एजेंडा के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई की बुनियाद रखी। पिछड़ों-दलितों के सामाजिक-राजनीतिक सशक्तिकरण का रास्ता खोला।*


*त्रिवेणी संघ का बिगुल*


*लेखक त्रिवेणी बंधु*


*30 मई, 1933 को सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और चौधरी जेएनपी मेहता ने किया था त्रिवेणी संघ का गठन*


*सवर्ण-अभिजात्य नेतृत्व में चल रही आजादी की लड़ाई की मुख्य धारा में अंग्रेजों से राज हासिल करने का सवाल था, लेकिन दलितों-पिछड़ों के लिए आजादी केवल अंग्रेजों के वापस अपने देश लौट जाने भर का सवाल नहीं था। उनके लिए सदियों से चली आ रही गुलामी से आजादी का सवाल भी महत्वपूर्ण था। बिहार की जमीन से त्रिवेणी संघ ने आजादी की लड़ाई में हाशिए के छोर से वैचारिक-राजनीतिक हस्तक्षेप किया।*


*जैसा कि आज भी जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय के सवालों पर ब्राह्मणवादी शक्तियों और सवर्ण वाम-प्रगतिशीलों की प्रतिक्रिया आती है, वैसे ही प्रतिक्रिया उस दौर में भी थी। कांग्रेस के लिए त्रिवेणी संघ सरकार और जमींदार प्रायोजित था तो किसान सभा की नजर में जातिवादी संगठन था। स्वामी सहजानंद और राहुल सांकृत्यायन आदि की धारणा भी त्रिवेणी संघ के बारे में ऐसी ही थी। कांग्रेस समर्थित अखबार भी त्रिवेणी संघ को जमींदारों द्वारा संचालित संगठन साबित करने की कोशिश में लगे थे। यहां तक कि 1937 में अंतरिम चुनाव के वक्त अपने दौरे में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पटना और आरा की सभा में त्रिवेणी संघ की आलोचना की। उन्होंने (त्रिवेणी संघ का नाम न लेते हुए) राजनीतिक संप्रदायों के उभरने पर आश्चर्य व्यक्त किया। जात-पांत के विचार से अपनी असहमति जताते हुए उन्होंने हर किसी से राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने के लिए काम करने की अपील की। (प्रसन्न कुमार चौधरी व श्रीकांत, बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 122)*


 *त्रिवेणी संघ पर लगाए जा रहे आरोपों के उलट सच्चाई यह थी कि उस दौर के बिहार के सभी बड़े नेता अपनी-अपनी जाति के संगठनों में संलिप्त थे। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआई कर रही कांग्रेस पर सवर्णों का कब्जा था। संगठन के नेतृत्वकारी निकायों और चुनाव में उम्मीदवार के बतौर पिछड़े-दलितों के लिए दरवाजा बंद था। जबकि पिछड़े-दलित आजादी की लड़ाई में जमीन पर खून-पसीना बहा रहे थे, जेल व दमन झेल रहे थे। यहां तक कि किसान सभा पर भी भूमिहार-ब्राह्मण जाति के खुशहाल कायमी रैयतों का कब्जा था। लगान में जाति आधारित भेदभाव और तरह-तरह के अबवाब (जमींदार के द्वारा मालगुजारी के अतिरिक्त वसूला जानेवाला कर), जिसे त्रिवेणी संघ ने छिपा लगान की संज्ञा दी थी, किसान सभा के मुद्दों से गायब थे।*


*त्रिवेणी संघ को लेकर आज भी भ्रम फैलाया गया है कि यह तीन जातियों – यादव, कुशवाहा और कुर्मी – का संगठन था। हिंदी व्याकरण के आधार पर त्रिवेणी के ‘त्रि’ को तीन जातियों से जोड़ दिया जाता है। इस तरह का भ्रम उस दौर में भी फैलाया जाता था। उस दौर में त्रिवेणी संघ के नेताओं ने ऐसे भ्रमों का खंडन स्पष्ट रूप में किया था कि यह वास्तविक खेतिहर समुदायों, व्यवसायियों और मजदूरों का संगठन है। जरूर ही त्रिवेणी संघ के गठन के केंद्र में तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों के लोग थे। लेकिन यह तमाम उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच के बतौर ही आगे बढ़ा। संगठन की दृष्टि संकीर्ण नहीं थी और एजेंडा व्यापक था। 1940 ई. में यदुनंदन प्रसाद मेहता द्वारा लिखित ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ तमाम दुष्प्रचार व आरोपों का जवाब देता है।*


*दरहकीकत, त्रिवेणी संघ ने धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक साम्राज्यवादियों के खिलाफ बिगुल फूंका था। सामाजिक न्याय की आंदोलन की नींव डालनेवाला यह संगठन धार्मिक धांधलियों, लूट, अन्याय, अत्याचार, अंधेरगर्दी और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता था। वह जन्म आधारित ऊंच-नीच के खिलाफ था और जाति के खात्मे का आकांक्षी था।*


*जरूर ही त्रिवेणी संघ बाहरी और भीतरी दोनों सरकारों के खिलाफ था। उसका मानना था कि भीतरी सरकार जमींदार, पूंजीपति और अपने को ऊंच तथा दूसरों को छोटे समझनेवाले अभिमानियों से बनी हुई है, जो गरीबों और वंचित समाज के लिए फिरंगी सरकार से भी खतरनाक है। ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में उल्लेखित है कि “त्रिवेणी संघ किसी भी सरकार को, जो बुरी हो, दूर करना चाहता है, बल्कि वह भीतरी सरकार की जड़ को भी उखाड़ देना चाहता है। यही भीतरी सरकार जमींदार, पूंजीपति और अपने को ऊंचा तथा दूसरों को छोटा समझने वाले अभिमानियों से बनी हुई है, जो गरीबों और अनुन्नत समाज के लिए विदेशी सरकार से भी अधिक खतरनाक है। जिसे हम कहते हैं राजनीतिक साम्राज्यवाद, जो पब्लिक वर्क्स से लेकर सरकारी महकमों तक या हेठ से ऊपर तक (नीचे से लेकर ऊपर तक) अपना आतंक फैलाए हुए है। गरीबों की वहां दाल नहीं गलती। यदि कोई भी अनुन्नत समाज का आदमी वहां पहुंच जाता है तो उन्हें छींक आने लगती है और कानाफूसी हो जाती है कि यह छोटी कौम का है – आने न पावे, ठहरने न पावे आदि-आदि।*


*ये बातें न केवल सरकारी नौकरियों तक ही रह गई है, बल्कि कांग्रेस-जैसी देशभक्त कहलाने वाली संस्था में भी आ गई है जैसा कि विगत चुनावों में देखा गया है।*


*(त्रिवेणी संघ का बिगुल, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा ऑनलाइन प्रकाशित आलेख से उद्धृत)*


*त्रिवेणी संघ ने आर्थिक साम्राज्यवाद के स्रष्टा के बतौर जमींदार, पूंजीपति तथा सरकार, चाहे वह देशी हो या विदेशी, को चिह्नित किया था। वह जमींदारों द्वारा खुला लगान के साथ छिपा लगान-बेगारी, नजराना के खिलाफ भी था। त्रिवेणी संघ किसानों के साथ न्याय, मजदूरों को मुनाफे के अनुसार मजदूरी, मजदूरों की सर्विस का ख्याल करने के साथ प्रोविडेंड फंड या पेंशन की व्यवस्था, वेतन की असमानता और बेकारी के सवाल पर भी बात करता था। त्रिवेणी संघ का साफ मानना था– जमीन अपने हाथ से हल चलानेवाले किसानों की है। त्रिवेणी संघ सेकुलर मूल्यों के साथ था, वह हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े के लिए पंडित और मौलवी को जिम्मेवार मानते हुए प्रेम-भाईचारे की बात करता था।*


*कुल मिलाकर त्रिवेणी संघ तमाम किस्म के अन्याय-गैरबराबरी के खिलाफ उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान और नागरिक अधिकारों की दावेदारी करता है और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि व सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक न्याय के व्यापक एजेंडा के साथ सामने आता है।*


*आज भी बढ़ते सवर्ण एकाधिकार और कॉरपोरेट कब्जा के हमलावर फासीवादी मुहिम के खिलाफ बिहार की जमीन से उभर रहे बहुजन आंदोलन के सामने यही चुनौती खड़ी है कि वह सामाजिक न्याय की राजनीति के सीमा-संकट से पार जाते हुए व्यापक एजेंडा पर बहुजनों की एकजुटता व स्वतंत्र दावेदारी को बुलंद करे। त्रिवेणी संघ के विरासत की यही मांग है।*


*(संपादन : राजन/नवल/अनिल)*


*फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें।*

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Tuesday, May 5, 2026

महिला और मनुस्मृति

 हिंदुओं के संविधान "मनुस्मृति" नामक धर्मग्रंथ में स्त्रियों के लिए क्या लिखा है, उसके कुछ अंश -


पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का हिंदुओं के संविधान "मनुस्मृति" नामक धर्मग्रंथ में स्त्रियों के लिए क्या लिखा है, उसके कुछ अंश -


पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते।


- मनुस्मृति, 2-213


चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनकी युवती स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है।


- मनुस्मृति, 2-214


जिस यज्ञ में स्त्री या नपुंसक ने हवन किया हो उस यज्ञ में ब्राह्मण कदापि भोजन न करें।


- मनुस्मृति, 4-205


बालिका हो या युवती या वृद्धा स्त्री को स्वतंत्रता पूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिए।


- मनुस्मृति, 5-147


स्त्री बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और पति का परलोक होने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे।


- मनुस्मृति, 5-148


पिता, पति या पुत्र से पृथक रहने की इच्छा न करे। इनसे अलग रहने वाली स्त्री दोनों कुलों (पति-पितृ) को निन्दित करती है।


- मनुस्मृति, 5-149


यदि पति अनाचारी हो या परस्त्री में अनुरक्त हो, या विद्यादि, गुणों से रहित हो, तो भी साध्वी स्त्री को सर्वदा देवता की तरह अपने पति की सेवा करनी चाहिए।


- मनुस्मृति, 5-154


स्त्रियों के लिए न यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है। पति की सेवा से ही वह स्वर्गलोक में पूजित होती है।


- मनुस्मृति, 5-155


पति के मरने पर स्त्री फल-फूल और मूल खाकर देह क्षीण करे, परन्तु पर पुरुष का कभी नाम न ले।


- मनुस्मृति, 5-157


पत्नी, पुत्र और सेवक, ये तीनों निर्धन कहे गए हैं क्योंकि इनका उपार्जन किया धन उस उसका होगा, जिसके ये पुत्र, कलत्र और सेवक हैं।


- मनुस्मृति, 8-416


पुरुषों को कभी अपने स्त्रियों को स्वतंत्रता न देनी चाहिए। स्त्रियाँ यदि रूप-रसादि में आसक्त हों तो भी उन्हें अपने वश में रखना चाहिए।


- मनुस्मृति, 9-2


स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता योग्य नहीं है।


- मनुस्मृति, 9-3


मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, अकाल में सूतना और दूसरे के घर में रहना ये छ: दोष स्त्रियों के दोष हैं।


- मनुस्मृति, 9-13


स्त्रियाँ रूप की प्रतिक्षा नहीं करती हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हो पुरुष होने ही से वे उसके साथ संभोग करती हैं।


- मनुस्मृति, 9-14


पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं।


- मनुस्मृति, 9-15


मनुजी ने सृष्टयादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी।


- मनुस्मृति, 9-17


धर्मशास्त्र के व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों की जातकर्मादि क्रियाएँ मंत्रों से नहीं करनी चाहिए, उन्हें मंत्रों का ज्ञान और अधिकार भी नहीं है, उनकी झूठ ही में स्थिति है।


- मनुस्मृति, 9-18


बेचने से या त्याग देने से स्त्री पति के पत्नीत्व से अलग नहीं होती है।


- मनुस्मृति, 9-46


जो स्त्री स्वामी के दूसरा ब्याह करने पर रुष्ट होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर में बंद कर देना चाहिए या उसको उसके बाप के घर पहुँचा देना चाहिए।


- मनुस्मृति, 9-83


कन्या, युवा स्त्री, थोड़े पढ़े-लिखे, मूर्ख, पीड़ित और जिनका यज्ञोपवीतादि नहीं हुआ है वे अग्निहोत्र के हवनीय कार्य को न करें।


- मनुस्मृति, 11-36 है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते।


- मनुस्मृति, 2-213


चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनकी युवती स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है।


- मनुस्मृति, 2-214


जिस यज्ञ में स्त्री या नपुंसक ने हवन किया हो उस यज्ञ में ब्राह्मण कदापि भोजन न करें।


- मनुस्मृति, 4-205


बालिका हो या युवती या वृद्धा स्त्री को स्वतंत्रता पूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिए।


- मनुस्मृति, 5-147


स्त्री बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और पति का परलोक होने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे।


- मनुस्मृति, 5-148


पिता, पति या पुत्र से पृथक रहने की इच्छा न करे। इनसे अलग रहने वाली स्त्री दोनों कुलों (पति-पितृ) को निन्दित करती है।


- मनुस्मृति, 5-149


यदि पति अनाचारी हो या परस्त्री में अनुरक्त हो, या विद्यादि, गुणों से रहित हो, तो भी साध्वी स्त्री को सर्वदा देवता की तरह अपने पति की सेवा करनी चाहिए।


- मनुस्मृति, 5-154


स्त्रियों के लिए न यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है। पति की सेवा से ही वह स्वर्गलोक में पूजित होती है।


- मनुस्मृति, 5-155


पति के मरने पर स्त्री फल-फूल और मूल खाकर देह क्षीण करे, परन्तु पर पुरुष का कभी नाम न ले।


- मनुस्मृति, 5-157


पत्नी, पुत्र और सेवक, ये तीनों निर्धन कहे गए हैं क्योंकि इनका उपार्जन किया धन उस उसका होगा, जिसके ये पुत्र, कलत्र और सेवक हैं।


- मनुस्मृति, 8-416


पुरुषों को कभी अपने स्त्रियों को स्वतंत्रता न देनी चाहिए। स्त्रियाँ यदि रूप-रसादि में आसक्त हों तो भी उन्हें अपने वश में रखना चाहिए।


- मनुस्मृति, 9-2


स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता योग्य नहीं है।


- मनुस्मृति, 9-3


मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, अकाल में सूतना और दूसरे के घर में रहना ये छ: दोष स्त्रियों के दोष हैं।


- मनुस्मृति, 9-13


स्त्रियाँ रूप की प्रतिक्षा नहीं करती हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हो पुरुष होने ही से वे उसके साथ संभोग करती हैं।


- मनुस्मृति, 9-14


पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं।


- मनुस्मृति, 9-15


मनुजी ने सृष्टयादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी।


- मनुस्मृति, 9-17


धर्मशास्त्र के व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों की जातकर्मादि क्रियाएँ मंत्रों से नहीं करनी चाहिए, उन्हें मंत्रों का ज्ञान और अधिकार भी नहीं है, उनकी झूठ ही में स्थिति है।


- मनुस्मृति, 9-18


बेचने से या त्याग देने से स्त्री पति के पत्नीत्व से अलग नहीं होती है।


- मनुस्मृति, 9-46


जो स्त्री स्वामी के दूसरा ब्याह करने पर रुष्ट होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर में बंद कर देना चाहिए या उसको उसके बाप के घर पहुँचा देना चाहिए।


- मनुस्मृति, 9-83


कन्या, युवा स्त्री, थोड़े पढ़े-लिखे, मूर्ख, पीड़ित और जिनका यज्ञोपवीतादि नहीं हुआ है वे अग्निहोत्र के हवनीय कार्य को न करें।


- मनुस्मृति, 11-36

Monday, May 4, 2026

दोस्त का अवसान

 *आज रात्रि में धनंजय भाई के अंतिम संस्कार बारहवीं में शामिल होने के क्रम में रहीम भाई के साथ दिवंगत धनंजय की सुपुत्री, दामाद, सास, अग्रज भ्राता, साला, साली, साढ़ू से मिला और ब्रह्मभोज के बाद जब भाभी से मिला तब वेदना और दुख के सभी भाव अनायास कौंधने लगा । माँ अर्थात अबधेश बाबू  अरे यार मुकरी चाचा की पत्नी के सामने विधवा बेटी । वह भी ८५ वर्ष की चहल क़दमी कम से कम रहीम भाई से अच्छा से चल रही थी …*


*सोंचिए माहौल कैसा गमगीन होगा ।शोक पीड़ित भाभी जी के आँखों से आँसू छलक कर पूरा माहौल गमगीन और भावुक होने लगा । हमदोनों तो निःशब्द थे ही । शांत माहौल में किसीने हमलोगों का जब नाम लिया तब उनकी पलकें नीचे फर्श की तरफ झुकी रह कर आँसू झरने की तरह और सिसकियाँ देखकर मुझमें बैठने की हिम्मत न थी । मिनटों में चुपचाप हमदोनों निकल गए, शायद सब्र का बांध टूटने के बाद जल्दी रुके । वेबकूफी कर गया कि भाभी जी से मिलने चला गया ! अफ़सोस उनसे नहीं मिलता तब कम से कम मैं भी उतना संजीदा न होता ।*


*जीवन में मरना ही सत्य है यह जानते हुए गुमशुम निकलकर आसमान निहारता रहीम भाई को गाड़ी में बैठाकर निकल गया । गाड़ी चलाते सभी बिछड़े दोस्तों के मन ही मन नाम लेकर उसकी यादों के साथ पों पाँ करते निकल गया ।*


*जनार्दन, अमलेन्द्र, राम सागर, संजीवन, मृगेंद्र, चाणक्य, सर्वानन्द आदि का चेहरा घूमने लगा तभी रहीम भाई सिगरेट पिओगे की आवाज आई और हाँ में मुंडी हिलाकर गाड़ी साईड कर सिगरेट की तलाश में मैं निकल आया । गली में २०० फीट दो तीन दुकान में पूछने पर जब सिगरेट नहीं मिला तब आसमान से बूँदा बूँदी होते देख लौट कर फिर गाड़ी चलाने लगा और कॉलेजियट स्कूल के गेट के आगे रहीम भाई को ड्राप करने के समय दोनों सिगरेट सुलगायी । अंतिम पफ तक पिया शायद गम को भी जला दूँ ।*


*कमबख़्त गम को जितना भूलना चाहो मन मश्तिष्क में और आता है । फिर ३.३० बजे भोर में नींद उचट गई और मोबाइल रूपी सेलेट पिन्सुल लेकर तुम दोस्तों को भी झकझोर दिया । भोर ४.४५ हो गया, कौआ की एक काव मैंने सुनी ।गुरुदत्त और मोहम्मद रफ़ी .. काग़ज़ के फूल का एक गाने के साथ विराम देता हूँ …*


*अरे देखी ज़माने की यारी*

*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*


*क्या ले के मिलें अब दुनिया से,* *आँसू के सिवा कुछ पास नहीं*

*या फूल ही फूल थे दामन में,* *या काँटों की भी आस नहीं*

*मतलब की दुनिया है सारी*

*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*


*वक़्त है महरबां, आरज़ू है जवां*

*फ़िक्र कल की करें, इतनी फ़ुर्सत कहाँ*


*दौर ये चलता रहे रंग उछलता रहे*

*रूप मचलता रहे, जाम बदलता रहे*


*रात भर महमाँ हैं बहारें यहाँ*

*रात गर ढल गयी फिर ये खुशियाँ कहाँ*

*पल भर की खुशियाँ हैं सारी*

*बढ़ने लगी बेक़रारी बढ़ने लगी बेक़रारी*

*अरे देखी ज़माने की यारी*

*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*


*उड़ जा उड़ जा प्यासे भँवरे, रस ना मिलेगा ख़ारों में*

*कागज़ के फूल जहाँ खिलते हैं, बैठ ना उन गुलज़ारो में*

*नादान तमन्ना रेती में, उम्मीद की कश्ती खेती है*

*इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से लेती है*

*ये खेल है कब से जारी*

*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*


https://youtu.be/s3LFjzxFKbw?si=gDEGN3CSBX6mip1L

Sunday, April 19, 2026

पटना बंदरगाह/ स्टीमर सेवा

Sunday musing....


*बच्चा बाबू के स्टीमर* : 👇




*महात्मा गांधी सेतु* के निर्माण के पहले *उत्तर बिहार को राजधानी पटना* से जोड़ने का एकमात्र मार्ग था *जलमार्ग* और इस पर चला करते थे *सोनपुर के रईस बच्चा बाबू के स्टीमर* पहले पहलेजा तक लोग बस और ट्रेन से आया करते थे और *पहलेजा से एलसीटी घाट महेंद्रु घाट और बांस घाट के बीच स्ट्रीमर* चला करते थे इनकी तयशुदा सीमा होती थी और इसके लिए टिकट लेकर लोगों को घंटों इंतजार करना होता था।

*रेलवे स्टीमर* के अलावा *पटना और पहलेजा घाट* के बीच लोगों के लिए *दो और स्टीमर सेवा* चलती थी। *बाँस घाट से बच्चा बाबू की स्टीमर सेवा* भी काफी लोकप्रिय थी। 

*बच्चा बाबू सोनपुर के रईस* थे, जिनकी *निजी कंपनी बाँस घाट से पहलेजा घाट के बीच स्टीमर सेवा* का संचालन करती थी।बड़ी संख्या में लोग इस सेवा से भी आते जाते थे। 


जब लोग राजधानी पटना से सफर करके अपने गाँव पहुँचते तो हालचाल के साथ ये भी पूछते कौन से जहाज से आये तो लोग जवाब देते बच्चा बाबू के जहाज से।


जहाज के इस सफर में इंतजार और सफर में काफी वक्त जाया हो जाता था। इसलिए *पढ़ाकू विद्यार्थी* अपनी किताबें खोल कर जहाज में पढ़ने बैठ जाते थे। समय का सदुपयोग करने के लिए। 


वहीं *पटना के कुर्जी* के पास मैनपुरा से लगी थी *गंगा एलसीटी सर्विस की सेवा*। एलसीटी मतलब *लैंडिग क्राफ्ट टैंक*। 


ऐसी फेरी का इस्तेमाल माल ढुलाई के लिए किया जाता था। तो *गंगा एलसीटी सर्विस पटना और पहलेजा के बीच माल ढुलाई* का महत्वपूर्ण साधन थी। 

इसके *आधार तल पर माल लोड किया जाता था वहीं ऊपरी तल पर लोग सफर* करते थे। *आधार तल पर दो ट्रक, कुछ जीपें, ढेर सारा खाने-पीने का सामान, मोटरसाइकिलें* आदि बुक करके लादी जाती थीं। 


वहीं *एलसीटी सेवा से सोनपुर मेले के समय बड़ी संख्या में हाथी घोड़े और दूसरे जानवर* भी लाद कर इस पार से उस पार लाये जाते थे। 


*गंगा एलसीटी सेवा* एक समय में *पटना में गंगा नदी पर एक बंदरगाह* की तरह हुआ करता था। अब ये सेवा बंद हो चुकी है। पर *पटना के मैनपुरा में एलसीटी घाट* नाम से इलाके का नाम अब भी मशहूर है। जहाज नहीं है, बंदरगाह नहीं पर नाम में उसकी *स्मृतियाँ कायम* है।  


*एलसीटी* के लिए पटना में इस्तेमाल में लाये जाने वाले *जहाज मूल ब्रिटिश रॉयल नेवी* की ओर से विकसित किये गये थे। *दूसरे विश्वयुद्ध* के दौरान इनका कई जगह इस्तेमाल हुआ। 


पहले इनका नाम *टैंक लैंडिग क्राफ्ट* हुआ करता था। बाद में *अमेरिकी नामकरण प्रणाली के मुताबिक इनका नाम एलसीटी (लैंडिंग क्राफ्ट वेसल)* हो गया।


कोई भी जहाज जब अपने मंजिल तक पहुँचने वाला होता था। चाहे पहलेजा की तरफ हो या फिर पटना तरफ। जहाज किनारे लगने से पहले ही बड़ी संख्या में कुली पानी में कूद-कूद कर तेजी से चारों तरफ से जहाज में घुस आते थे। मानो वे जहाज पर हमला करने आये हों। उसके बाद वे अपने ग्राहकों की तलाश में जुट जाते किसे कुली चाहिए। जो हाँ कहता उसके सामान पर कब्जा कर लेते। 


उस जमाने में उत्तर बिहार के लोग बहुत आयत जूट के मील जिसे स्थानीय भाषा में चटकल कहा जाता था में मौसमी नौकरी करने पश्चिम बंगाल जाते थे, तब के जमाने में पश्चिम बंगाल में चटकल मिलों में आसानी से लोगों को काम मिल जाता था। 


भोजपुरिया गीत-संगीत और स्मृतियों में आज भी बंगाल, इसी कारण से लोगों के जेहन में कायम है *भिखारी ठाकुर से लेकर महेंद्र मिश्र* तक लोक गायकों ने बंगाल के इन्हीं कामासूतो को देख कर के अपने गीत *गवनई को जीवंत* किया। बीड़ी पीना, लूंगी पहनना और चाय का आध बंगाल से ही बिहार आया। 


सोनपुर और पटना के बीच में चलने वाले जहाज में भी उस जमाने में टिकट के रेट के हिसाब से व्यवस्था होती थी *वन क्लास और सामान्य क्लास* गाड़ियों को लगने से लेकर समान तक की ढुलाई होती थी। 


एक और साधन था वह *गांधी घाट और रानी घाट के बीच बडहरवा घाट से सोनपुर मेले* के 1 महीने पहले से *बच्चा बाबू का जहाज पटना से गंगा पार कर दियारा* तक ले जाया जाता था। जिसका सदुपयोग कर *सोनपुर मेला जाने वाले यात्री और जानवरों की खरीद और बिक्री के लिए ले जाए जाते थे*।

सेवानिवृत्ति आलेख्य

 ई० नलिन कुमार सिन्हा

तकनीकी प्रवैधिक, अभियंता प्रमुख, ग्रामीण कार्य विभाग 

की सेवा निवृत्ति के शुभ अवसर पर उनके कर-कमलों के अभिनव कुसुम पराग सस्नेह समर्पित


अभिनन्दन-पत्र

मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र की पावन धरती के तकनीकी सचिवालय, विश्वेश्वरैया भवन अवस्थित ग्रामीण कार्य बिभाग, पटना से दिनांक 31 जनवरी 2023, मंगलवार के अपराह्न तक 35 वर्ष 7 माह की सेवा करने के पश्चात, सरलचित्त, उदारचरित अपने पद पर आसीन रहते हुए सफलतापूर्वक सेवानिवृत्त हो रहे हैं, यह हमलोगों के लिए गौरवान्वित एवम भावुक क्षण है ।

हमें अपार हर्ष है क्योंकि एक कर्मठ अभियंता के रुप में बिभाग के तकनीकी कार्यों का सम्पादन किये हैं और दूसरी तरफ विषाद इसलिए कि अभिन्न एवम कर्तव्यनिष्ठ अभियंता जिसमें प्रबंधन, प्रशासनिक दूरदर्शिता के साथ साथ मित्रवत व्यबहार रहा है, हमसे दूर जा रहे हैं ।

ग्राम- कल्याण बीघा, नालन्दा निवासी श्री सिन्हा का जन्म 3-01-1963 को पटना जिला में हुआ । मैट्रिक में विशेष स्थान के बाद प्रख्यात सायन्स कॉलेज, पटना से इंटर पास कर BCE पटना (सम्प्रति NIT पटना) से 1986 में B. Sc. Civil Engineering की प्रथम श्रेणी में स्नातक डिग्री के पश्चात BIT सिन्दरी के CIVIL विभाग में अंशकालिक व्याख्याता के पद पर कार्य करने के पश्चात 22 जून 1987 को बिहार अभियंत्रण सेवा अंतर्गत जल संसाधन बिभाग, बिहार सरकार में सहायक अभियंता के पद पर योगदान दिया । जलसंसाधन विभाग अंतर्गत अग्रिम योजना मोकामा टाल परियोजना, गुमानी बराज, बरहेट, साहेबगंज, रुपांकण प्रमंडल, देवघर (झारखंड), सोन नहर आधुनिकीकरण योजना, पूर्वी गंडक नहर का आधुनिकीकरण का सूत्रण, अनुश्रवण, मूल्यांकण से लेकर पालिसी फ्रेमिंग के कार्यों के सम्पादन के बाद 22 जुलाई 2008 से 30 जून 2013 तक ग्रामीण कार्य विभाग में पथों , पुलों का निर्माण एवम मुख्यालय स्तर पर क्षमता संवर्द्धन कार्य  करने के बाद कार्यपालक अभियंता के रुप में कार्य प्रमंडल कटिहार अंतर्गत निर्माण एवम अनुरक्षण के दायित्वों का दक्षतातापूर्वक निर्वहन किया है । 22 जून 2016 से मुख्यालय स्तर पर नाबार्ड नोडल एवम राज्यस्तरीय महत्वाकांक्षी MMGSY परियोजना के नोडल के पद पर आसीन रहकर राज्य के सभी कोरनेटवर्क योजनाओं की स्वीकृति एवम कार्यो का कुशल अनुश्रवण किया है । आपने वाह्य ऋण सम्पोषित विश्व बैंक और NDB योजनाओं के परियोजना निदेशक के रुप में भारत सरकार और ऋण संस्थानों के साथ सफल अनुश्रवण का कार्य किया है । वर्ष 2019 से अधीक्षण अभियंता के रुप में गुणवत्ता प्रबन्धन कोषांग एवं अभियंता प्रमुख के प्रावैधिक सचिव के साथ साथ पूर्ववत MMGSY कोषांग के कार्यो के दायित्वों का दक्षता एवम कुशलता के साथ 31 जनवरी 23 तक सम्पादित किया है । सेवा काल में आपने बर्मिंघम विश्वविद्यालय, इंग्लैंड में साप्ताहिक, वाल्मी में त्रैमासिक  IIM लुखनऊ में पाक्षिक, IIM अहमदाबाद, CSIR ओखला, IHAE नोएडा में पाक्षिक एवम अन्य प्रतिष्ठानों में विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया है । आपकी दक्षता, प्रशासनिक क्षमता एवम MMGSY में पथों एवम पुलों के निर्माण में योगदान के कारण 27-05-2018 को राज्यस्तरीय कार्यक्रम में माननीय मुख्यमंत्री, बिहार सरकार, आदरणीय नीतीश कुमार द्वारा पुरस्कार प्रदान किया गया है । 

इस लंबे सेवाकाल में विभन्न विभागों के भिन्न भिन्न स्तर के पदों पर आसीन रहकर आपने उत्तरदायित्वपूर्ण एवम कुशलता से कार्यो का निष्पादन किया है जिसमें MMGSY का कार्यकाल सदैव स्वर्णिम काल के रुप में याद किया जाएगा । अधिकारियों एवम कर्मचारियों के मध्य आप एक कड़क पदाधिकारी एवम विभाग की समस्याओं के त्वरित निवारण में अग्रणी भूमिका अदा की है । आप आस-पास रहकर तो सदैव मार्ग दर्शन करते रहे हीं हैं , आशा एवम पूर्ण आस्था है कि आप दूर रहकर भी हमारे रहेगें ।

विदाई की इस कठिन वेला में हम आपके क्रियमान शक्तियों का गुणानुवाद करने में असमर्थ हो रहे हैं । अतः यदि किसी मोड़ पर हम पदाधिकारी- कर्मचारी से किसी प्रकार की भूल हुई हो जिससे आप आहत हुए हों तो इसके लिए हम सभी क्षमा प्रार्थी हैं ।

पदाधिकारीगण एवम कर्मचारीगण की हार्दिक कामना है कि आप जहाँ भी, जिस क्षेत्र या परिवेश में पदार्पण करे -वह फलदायी हो- मंगलकारी हो ।

हम हैं:-

आपके स्नेहाभिशिक्त पदाधिकारी एवम कर्मचारीगण ग्रामीण कार्य बिभाग, बिहार पटना ।

Wednesday, May 28, 2025

चार धाम

चारधाम यात्रा वृत्तांत


मैं और मेरे बहनोई सपत्नीक दोनों देहरादून अपने बड़े साढू डीआरडीओ से सेवानिवृत  के साथ १८ मई को प्रातः ८ बजे मसूरी के रास्ते कैंप्टी फ़ाल होते बाराकोट के समीप कैम्प नंदगांव के yaantra रिसोर्ट में पहुँचे (कुल दूरी - २०० कि मी)। रास्ते में पांडवों के लाखा गृह के दर्शन भी श्रद्धालु करते हैं ।प्रातः स्नान के पश्चात ४ बजे हनुमानचट्टी, जानकी चट्टी होते हुए १९ मई को ७ किलोमीटर संकरे पहाड़ों के मार्ग से होकर गर्म कुंड (सूर्य कुंड), दिव्य शिला पूजन के बाद सूर्य पुत्री यमराज और शनि देव की बहन यमुना जी के उद्गम स्थल यमुनोत्री का दर्शन के पश्चात पुनः शाम ६ बजे तक निर्वाणा रिसोर्ट पहुँचे । गर्म कुंड का प्रसाद कच्चा चावल को पोटली में डालकर भात की मान्यता है ।यमुनोत्री चढ़ाई कष्टकर है जिसका तापमान दिन में भी ४डिग्री था पर जानकी चट्टी का तापमान १८ डिग्री सेल्सियस था । चढ़ाई के लिए श्रद्धालु पिट्ठू, घोड़ा, डोली या पैदल एकमात्र उपाय है ।

२० मई को उत्तरकाशी में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन (दूरी-१२५KM) के पश्चात भागीरथी नदी के तट पर आरती स्थल के समीप साक्षी रिसोर्ट में विश्राम किया । यह स्थल नौका विहार के लिए भी प्रसिद्ध है । २१ मई प्रातः ५ बजे नित्य कर्म से निवृत होकर हरसिल के रास्ते हिमालय के खूबसूरत घाटियों से होकर गनगनी hot spring वाटर स्नान के पश्चात गंगोत्री में भागीरथ के आह्वान स्थल पर गंगोत्री में स्नान दर्शन पूजा के पश्चात शाम ७ बजे  भागीरथी नदी के तट पर साक्षी में विश्राम किया ।(दूरी-up _ down २००KM)

२२ मई २००KM भ्रमण उत्तरकाशी से प्रारंभ कर बूढ़ा केदार, रुद्र प्रयाग के रास्ते गुप्त काशी के कैम्प निर्वाणा रिसोर्ट में रात्रि विश्राम किया । यहाँ पंच केदार की मान्यता है , जिसमें बूढ़ा केदार में पशु के वेश में रहने के कारण पांडवों ने पहचान नहीं कर पाया । गुप्त काशी से सोन प्रयाग और गौरी कुंड स्नान के पश्चात १६ किलोमीटर के ट्रेक पर केदारनाथ जी मंदाकिनी नदी के उद्गम स्थल पर है ।

23 May मैंने प्रातः काली मठ में देवी दर्शन के पश्चात केदार नाथ के लिए प्रस्थान किया ।मैंने फाँटा से हेलीकॉप्टर [जो बरसात या मौसम के अनुसार स्थगित भी हो जाता है ।] से केदार पहुँच कर केदारनाथ जी, भैरव, भीम शिला, शंकराचार्य समाधि स्थल का दर्शन रात्रि में २4 मई को प्रातः २ बजे विशेष पूजा अर्चना कर (रात भर बारिश के कारण अधिक ठंढ की अनुभूति -१degree एक डोरमेटरी होटल में ठहरा था ) ४ घंटे की प्रतीक्षा के पश्चात २४ मई को हेलीकॉप्टर से फाँटा के रास्ते गुप्त काशी के रिसोर्ट लौटकर रात्रि विश्राम किया । केदारनाथ जी के स्थल का विवरण पंक्ति में लिपिबद्ध करना संभव नहीं है ।

२५ मई को गुप्तकाशी में अर्द्धनारेश्वर मन्दिर दर्शन और शारदीय केदारनाथ जी के ऊखीमठ स्थल में पूजा अर्चना के पश्चात चोपता वैली (Mini Switzerland)के अति प्राकृतिक मनोहारी दृश्य के पश्चात हिरण्यकश्यपु मंदिर के दर्शन के पश्चात जोशीमठ के रास्ते बद्रीनाथ के Amrita the Awadh में रात्रि विश्राम किया ।

२६ मई प्रातः ३ बजे स्नान कर बद्री नाथ जी के प्रातः आरती और गर्म कुंड के मार्ग से बद्रीनाथ जी का दर्शन पूजन हवन कर होटल में ६ बजे पहुँचा । बद्री नाथ अलकनंदा नदी पर अवस्थित है । भारत चीन बॉर्डर पर अंतिम गांव माना सरस्वती और अलकनंदा के संगम पर अवस्थित है । माना ग्राम में चाय का भारत में सबसे प्रथमबार उपयोग में लाया गया था । २KM ट्रेक पर गणेश मंदिर, व्यास गुफा दर्शन, भीम पुल, सरस्वती नदी का उद्गम स्थल, स्वर्ग द्वार जिससे पांडवों में हिमालय शृंखला से भैरव की पूंछ आसरे स्वर्ग प्रस्थान स्थल का भ्रमणोप्रांत Auli वैली होकर जोशीमठ - विष्णु प्रयाग के रास्ते कर्ण प्रयाग नंद प्रयाग होते हुए रुद्र प्रयाग मोनल रिसोर्ट में रात्रि ९ बजे पहुँचा ।Aulli वैली अति मनोहारी है ।( २००KM)

२७ मई को रास्ते में अलकनंदा नदी में शक्ति माता धारी देवी और देव प्रयाग भागीरथी और अलकनंदा के संगम के पश्चात गंगा नदी का दर्शनकर देवभूमि दर्शनोपरांत ऋषिकेश भ्रमणोपरांत मैं देहरादून रात ८ बजे यात्रा समाप्त किया ।(१६०KM)

*नोट:- बद्री नाथ और गंगोत्री में कोई ट्रेक नहीं है पर मौसम किसी क्षण परिवर्तन हो सकता है । दिन का तापमान मई में ९ डिग्री सेल्सियस था पैट रात्रि में तापमान २ डिग्री तक पहुँच जाता है ।

केदारनाथ और यमुनोत्री सड़क मार्ग पर अवस्थित नहीं है जिसके लिए आपको ट्रेक करना होगा तापमान कमोबेश रात में २ डिग्री - दिन में ९ डिग्री के क़रीब था ।

मौसम की भविष्यवाणी करना बहुत ही कठिन है ।

गर्म क्लॉथ inner, जैकेट, रेनकोट, छाता, knee cap, दस्ताना, ट्रेक shoes, आवश्यक दवा या पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलिंडर आवश्यकतानुसार जरूरी है ।

Thursday, January 16, 2025

हिन्दी महीना के अनुसार वर्जित खाने की बस्तु

*भारतीय जलवायु में स्वास्थ्य के प्रकृति के अचूक नियम*


○चैते गुङ ○बैशाखे तेल, ○जेठे पंथ ○असाढै बेल ।

○सावन साग ○भादो दही , ○क्वार करेला ○कातिक मही,

○अगहन जीरा ○पुष धनिया, ○माघे मिसरी ○फागुण चना ।।।

○ ईं बारह से देह बचाय तो घर वैद्य कबहूँ ना आय ।।

                                       (ग्रामीण कहावत)


      ●हिन्दी भावार्थ 


   *बारह महीनों में अलग अलग वो ऐसी चीजें जिनका हम परहेज करके निरोगी रह सकते हैं।*


 *१) चैत  - गुङ नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इस महीने का नया गुङ पथ्य नहीं होता।*


 *२) वैशाख  - तेल नहीं खायें क्योंकि वैशाख में जो पसीना निकलता हैं उन छिद्रों को तेल अवरूद्ध कर देती हैं।*


 *३) ज्येष्ठ  - पंथ यानी पथ - रास्ता पर पैदल नहीं चलना चाहिए क्योंकि इस महिने गर्मी बहुत ज्यादा होने से शरीर डिहाइड्रेशन  में आ जायेगा।*


 *४) आसाढ - बेल फल बहुत गुणकारी होकर भी आसाढ में खाने योग्य नहीं होता।*


 *५) श्रावण  - सावण में पत्ते वाले आहार न लें क्योंकि इस मास में बरसात के समय पृथ्वी गर्भीणी होकर अदृश्य असंख्य जीव पैदा करती हैं जिनके अंडज पत्तों पर भी होते हैं।*


 *६) भादो - इस महिने में दही के जो पथ्य बैक्टीरिया होते हैं वो ह्युमिडिटी के चलते जल्दी जल्दी बढ़कर खतरनाक हो जाते हैं।*


 *७) आसीन- करेला आसीन में पकाकर खाने योग्य नहीं रहता। करेला पितकारक होता हैं।*


 *८) कार्तिक  - कार्तिक में मही यानी मट्ठा ना खायें क्योंकि कार्तिक से हमें ठंडा नहीं गरम आहार शुरू कर देना चाहिए।*


 *९) अगहन - जीरा ना खायें क्योंकि जीरा प्रकृतिगत ठंडा होता हैं। जबकि अगहन में ठंड ही होती हैं।*


 *१०) पौष - पौष में धनिया ना खायें क्योंकि धनिये की प्रकृति ठंडी होती हैं। सर्दियों के इन दिनों में गर्म प्रकृतिगत व्यंजन खाना चाहिए ।गर्मियों में सिर्फ धनिये के लड्डू बनाकर खावें।*


 *११) माघ - माघ में मिश्री ना खायें । मिश्री की तासीर भी ठंडी होती हैं जो गरम ऋतू में धनिये के लड्डुओं के साथ खावें हैं।*


 *१२) फाल्गुन- फाल्गुन में चना ना खावें । एकदम नया चना गैस कारक होता हैं। फाल्गुन में वायुमंडल में भी इधर-उधर की बिना ठिकाने की हवा चलती रहती हैं। मौसम भी कभी कैसा तो कभी कैसा रहता हैं। चना वैसे भी गैस कारक होता है ।*

  

*इस प्रकार अगर आप अपथ्य का पालन करेंगे तो शरीर को जरूर सुरक्षित रख पायेंगे।*