हिंदुओं के संविधान "मनुस्मृति" नामक धर्मग्रंथ में स्त्रियों के लिए क्या लिखा है, उसके कुछ अंश -
पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का हिंदुओं के संविधान "मनुस्मृति" नामक धर्मग्रंथ में स्त्रियों के लिए क्या लिखा है, उसके कुछ अंश -
पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते।
- मनुस्मृति, 2-213
चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनकी युवती स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है।
- मनुस्मृति, 2-214
जिस यज्ञ में स्त्री या नपुंसक ने हवन किया हो उस यज्ञ में ब्राह्मण कदापि भोजन न करें।
- मनुस्मृति, 4-205
बालिका हो या युवती या वृद्धा स्त्री को स्वतंत्रता पूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिए।
- मनुस्मृति, 5-147
स्त्री बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और पति का परलोक होने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे।
- मनुस्मृति, 5-148
पिता, पति या पुत्र से पृथक रहने की इच्छा न करे। इनसे अलग रहने वाली स्त्री दोनों कुलों (पति-पितृ) को निन्दित करती है।
- मनुस्मृति, 5-149
यदि पति अनाचारी हो या परस्त्री में अनुरक्त हो, या विद्यादि, गुणों से रहित हो, तो भी साध्वी स्त्री को सर्वदा देवता की तरह अपने पति की सेवा करनी चाहिए।
- मनुस्मृति, 5-154
स्त्रियों के लिए न यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है। पति की सेवा से ही वह स्वर्गलोक में पूजित होती है।
- मनुस्मृति, 5-155
पति के मरने पर स्त्री फल-फूल और मूल खाकर देह क्षीण करे, परन्तु पर पुरुष का कभी नाम न ले।
- मनुस्मृति, 5-157
पत्नी, पुत्र और सेवक, ये तीनों निर्धन कहे गए हैं क्योंकि इनका उपार्जन किया धन उस उसका होगा, जिसके ये पुत्र, कलत्र और सेवक हैं।
- मनुस्मृति, 8-416
पुरुषों को कभी अपने स्त्रियों को स्वतंत्रता न देनी चाहिए। स्त्रियाँ यदि रूप-रसादि में आसक्त हों तो भी उन्हें अपने वश में रखना चाहिए।
- मनुस्मृति, 9-2
स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता योग्य नहीं है।
- मनुस्मृति, 9-3
मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, अकाल में सूतना और दूसरे के घर में रहना ये छ: दोष स्त्रियों के दोष हैं।
- मनुस्मृति, 9-13
स्त्रियाँ रूप की प्रतिक्षा नहीं करती हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हो पुरुष होने ही से वे उसके साथ संभोग करती हैं।
- मनुस्मृति, 9-14
पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं।
- मनुस्मृति, 9-15
मनुजी ने सृष्टयादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी।
- मनुस्मृति, 9-17
धर्मशास्त्र के व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों की जातकर्मादि क्रियाएँ मंत्रों से नहीं करनी चाहिए, उन्हें मंत्रों का ज्ञान और अधिकार भी नहीं है, उनकी झूठ ही में स्थिति है।
- मनुस्मृति, 9-18
बेचने से या त्याग देने से स्त्री पति के पत्नीत्व से अलग नहीं होती है।
- मनुस्मृति, 9-46
जो स्त्री स्वामी के दूसरा ब्याह करने पर रुष्ट होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर में बंद कर देना चाहिए या उसको उसके बाप के घर पहुँचा देना चाहिए।
- मनुस्मृति, 9-83
कन्या, युवा स्त्री, थोड़े पढ़े-लिखे, मूर्ख, पीड़ित और जिनका यज्ञोपवीतादि नहीं हुआ है वे अग्निहोत्र के हवनीय कार्य को न करें।
- मनुस्मृति, 11-36 है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते।
- मनुस्मृति, 2-213
चाहे मूर्ख हो या विद्वान उनकी युवती स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है।
- मनुस्मृति, 2-214
जिस यज्ञ में स्त्री या नपुंसक ने हवन किया हो उस यज्ञ में ब्राह्मण कदापि भोजन न करें।
- मनुस्मृति, 4-205
बालिका हो या युवती या वृद्धा स्त्री को स्वतंत्रता पूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिए।
- मनुस्मृति, 5-147
स्त्री बाल्यकाल में पिता के, यौवनावस्था में पति के और पति का परलोक होने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे।
- मनुस्मृति, 5-148
पिता, पति या पुत्र से पृथक रहने की इच्छा न करे। इनसे अलग रहने वाली स्त्री दोनों कुलों (पति-पितृ) को निन्दित करती है।
- मनुस्मृति, 5-149
यदि पति अनाचारी हो या परस्त्री में अनुरक्त हो, या विद्यादि, गुणों से रहित हो, तो भी साध्वी स्त्री को सर्वदा देवता की तरह अपने पति की सेवा करनी चाहिए।
- मनुस्मृति, 5-154
स्त्रियों के लिए न यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है। पति की सेवा से ही वह स्वर्गलोक में पूजित होती है।
- मनुस्मृति, 5-155
पति के मरने पर स्त्री फल-फूल और मूल खाकर देह क्षीण करे, परन्तु पर पुरुष का कभी नाम न ले।
- मनुस्मृति, 5-157
पत्नी, पुत्र और सेवक, ये तीनों निर्धन कहे गए हैं क्योंकि इनका उपार्जन किया धन उस उसका होगा, जिसके ये पुत्र, कलत्र और सेवक हैं।
- मनुस्मृति, 8-416
पुरुषों को कभी अपने स्त्रियों को स्वतंत्रता न देनी चाहिए। स्त्रियाँ यदि रूप-रसादि में आसक्त हों तो भी उन्हें अपने वश में रखना चाहिए।
- मनुस्मृति, 9-2
स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता योग्य नहीं है।
- मनुस्मृति, 9-3
मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, अकाल में सूतना और दूसरे के घर में रहना ये छ: दोष स्त्रियों के दोष हैं।
- मनुस्मृति, 9-13
स्त्रियाँ रूप की प्रतिक्षा नहीं करती हैं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हो पुरुष होने ही से वे उसके साथ संभोग करती हैं।
- मनुस्मृति, 9-14
पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं।
- मनुस्मृति, 9-15
मनुजी ने सृष्टयादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी।
- मनुस्मृति, 9-17
धर्मशास्त्र के व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों की जातकर्मादि क्रियाएँ मंत्रों से नहीं करनी चाहिए, उन्हें मंत्रों का ज्ञान और अधिकार भी नहीं है, उनकी झूठ ही में स्थिति है।
- मनुस्मृति, 9-18
बेचने से या त्याग देने से स्त्री पति के पत्नीत्व से अलग नहीं होती है।
- मनुस्मृति, 9-46
जो स्त्री स्वामी के दूसरा ब्याह करने पर रुष्ट होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर में बंद कर देना चाहिए या उसको उसके बाप के घर पहुँचा देना चाहिए।
- मनुस्मृति, 9-83
कन्या, युवा स्त्री, थोड़े पढ़े-लिखे, मूर्ख, पीड़ित और जिनका यज्ञोपवीतादि नहीं हुआ है वे अग्निहोत्र के हवनीय कार्य को न करें।
- मनुस्मृति, 11-36
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