*आज रात्रि में धनंजय भाई के अंतिम संस्कार बारहवीं में शामिल होने के क्रम में रहीम भाई के साथ दिवंगत धनंजय की सुपुत्री, दामाद, सास, अग्रज भ्राता, साला, साली, साढ़ू से मिला और ब्रह्मभोज के बाद जब भाभी से मिला तब वेदना और दुख के सभी भाव अनायास कौंधने लगा । माँ अर्थात अबधेश बाबू अरे यार मुकरी चाचा की पत्नी के सामने विधवा बेटी । वह भी ८५ वर्ष की चहल क़दमी कम से कम रहीम भाई से अच्छा से चल रही थी …*
*सोंचिए माहौल कैसा गमगीन होगा ।शोक पीड़ित भाभी जी के आँखों से आँसू छलक कर पूरा माहौल गमगीन और भावुक होने लगा । हमदोनों तो निःशब्द थे ही । शांत माहौल में किसीने हमलोगों का जब नाम लिया तब उनकी पलकें नीचे फर्श की तरफ झुकी रह कर आँसू झरने की तरह और सिसकियाँ देखकर मुझमें बैठने की हिम्मत न थी । मिनटों में चुपचाप हमदोनों निकल गए, शायद सब्र का बांध टूटने के बाद जल्दी रुके । वेबकूफी कर गया कि भाभी जी से मिलने चला गया ! अफ़सोस उनसे नहीं मिलता तब कम से कम मैं भी उतना संजीदा न होता ।*
*जीवन में मरना ही सत्य है यह जानते हुए गुमशुम निकलकर आसमान निहारता रहीम भाई को गाड़ी में बैठाकर निकल गया । गाड़ी चलाते सभी बिछड़े दोस्तों के मन ही मन नाम लेकर उसकी यादों के साथ पों पाँ करते निकल गया ।*
*जनार्दन, अमलेन्द्र, राम सागर, संजीवन, मृगेंद्र, चाणक्य, सर्वानन्द आदि का चेहरा घूमने लगा तभी रहीम भाई सिगरेट पिओगे की आवाज आई और हाँ में मुंडी हिलाकर गाड़ी साईड कर सिगरेट की तलाश में मैं निकल आया । गली में २०० फीट दो तीन दुकान में पूछने पर जब सिगरेट नहीं मिला तब आसमान से बूँदा बूँदी होते देख लौट कर फिर गाड़ी चलाने लगा और कॉलेजियट स्कूल के गेट के आगे रहीम भाई को ड्राप करने के समय दोनों सिगरेट सुलगायी । अंतिम पफ तक पिया शायद गम को भी जला दूँ ।*
*कमबख़्त गम को जितना भूलना चाहो मन मश्तिष्क में और आता है । फिर ३.३० बजे भोर में नींद उचट गई और मोबाइल रूपी सेलेट पिन्सुल लेकर तुम दोस्तों को भी झकझोर दिया । भोर ४.४५ हो गया, कौआ की एक काव मैंने सुनी ।गुरुदत्त और मोहम्मद रफ़ी .. काग़ज़ के फूल का एक गाने के साथ विराम देता हूँ …*
*अरे देखी ज़माने की यारी*
*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*
*क्या ले के मिलें अब दुनिया से,* *आँसू के सिवा कुछ पास नहीं*
*या फूल ही फूल थे दामन में,* *या काँटों की भी आस नहीं*
*मतलब की दुनिया है सारी*
*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*
*वक़्त है महरबां, आरज़ू है जवां*
*फ़िक्र कल की करें, इतनी फ़ुर्सत कहाँ*
*दौर ये चलता रहे रंग उछलता रहे*
*रूप मचलता रहे, जाम बदलता रहे*
*रात भर महमाँ हैं बहारें यहाँ*
*रात गर ढल गयी फिर ये खुशियाँ कहाँ*
*पल भर की खुशियाँ हैं सारी*
*बढ़ने लगी बेक़रारी बढ़ने लगी बेक़रारी*
*अरे देखी ज़माने की यारी*
*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*
*उड़ जा उड़ जा प्यासे भँवरे, रस ना मिलेगा ख़ारों में*
*कागज़ के फूल जहाँ खिलते हैं, बैठ ना उन गुलज़ारो में*
*नादान तमन्ना रेती में, उम्मीद की कश्ती खेती है*
*इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से लेती है*
*ये खेल है कब से जारी*
*बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी*
https://youtu.be/s3LFjzxFKbw?si=gDEGN3CSBX6mip1L